International Journal of Advanced Educational Research

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ISSN: 2455-6157

Vol. 2, Issue 5 (2017)

वैश्विक अस्थिरताः स्थिति और समाधान, विश्लेषण वैश्विक परिप्रेक्ष्य में

Author(s): डाॅ0 विद्याधर पाण्डेय
Abstract:
अपने विकास क्रम में मानव अनेक संकटों से उबरकर जिया। इस संकटकाल और संस्कृत निर्माण दोनों में ही नारी मानव विकास क्रम का हिस्सा अवश्य रही होगी। नैसर्गिक नियमों के कारण नारी-पुरूष न केवल समीप आये बल्कि उन्होंने विकास क्रम में एक दूसरे की आवश्यकता को समझा होगा। यह वह काल था जब मानव का संवेदना के स्तर पर विकास होने लगा। यह विकास उसे अन्य जंगली जीवों से अलग रहने को विवश करने लगा।
वैसे तो अभी तक आतंकवाद की सर्वस्वीकृत वैश्विक परिभाषा नहीं बनी है तथापि मोटे तौर पर, किसी विचार विचाराधात्मक आधार पर की गई हिंसा, जिसमें बड़ी तादात में निर्दाेष आम जनता मारी जाती है, आतंकवादी घटना कहलाती है। आतंकवाद का क्षेत्र विस्तार अत्यन्त तीव्र गति से हो रहा है। पूर्व में कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहने वाले आतंकवाद ने आज सम्पूर्ण विश्व में अपने पैर पसार दिए हैं। इस बात का उदाहरण इसी बात से मिलता है कि विभिन्न देशों के द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सम्बन्धों में तथा विभिन्न वैश्विक संगठनों की बैठक में आतंकवाद का मुद्दा और इस रणनीति की बातचीत अनिवार्य सी हो गयी है। इससे यह प्रश्न उठता है कि वास्तव में आतंकवाद है क्या? क्या उग्रवादी हिंसा, डकैतो की लूटपाट, तथा नक्सलवाद व क्षेत्रवाद की हिंसाएं आतंकवादी कार्रवाइयां नहीं है? यदि नहीं तो इनमें अंतर क्या है? आतंकवाद के विशिष्ट गुण क्या हैं? वैश्विक तथा भारतीय परिस्थितियों में आतंकवाद का प्रसार कितना है? इसके संगठन कौन से हैं। इसके कारण रूप और उद्देश्य क्या हैं? और अंतिम प्रश्न यह है कि आतंकवाद की समस्या का समुचित समाधान क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर हम आतंकवाद का विवेचन और विश्लेषण करके समझ सकते हैं।

Pages: 329-331  |  1037 Views  324 Downloads
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