International Journal of Advanced Educational Research

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International Journal of Advanced Educational Research
Vol. 3, Issue 4 (2018)

वैदिक एवं वैदिकोत्तर काल में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन


डाॅ0 संजय कुमार मिश्रा

संस्कृति विकास के श्रेष्ठ काल वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति सुखद रही। वैचारिक, पारिवारिक, धार्मिक स्वतंत्रता के इस दौर में महिलाओं का समान और प्रतिष्ठा पुरुष से कम समाज में नहीं था। शिक्षा और आत्म विकास के मार्ग महिलाओं के लिए खुले थे। सामािजक प्रतिबद्धता और वर्जनाएॅ कठोर नहीं होने से आत्मतुष्टि और समग्र विकास के मार्ग पुरुषों के समान ही महिलाओं के लिए खुले थे। शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में बराबर की सहभागिता से महिलाओं का पूर्ण विकास इस युग में हुआ। वे मातृत्व और पत्नित्व के लिए अपना सम्यक चिंतन रखती थी। मान्यताएँ और परम्पराएँ जटिल और कठोर न होने के कारण नारी विकास के मार्ग सुलभ और सहज थे।
वैदिकोत्तर काल में सामाजिक व्यवस्था क्रमशः रूढ़िवादी होकर परम्परा निबंद्ध होती गयी। समाज में पुरुषवादी व्यवस्था का जोर बढ़ता गया। फलतः महिलाओं के ऊपर बंधन धीरे-धीरे कठोरतम होते गये। जिसमें उनकी स्वतंत्र अस्तित्व तिरोहित होता गया। नारी व्यक्ति के स्थान पर वस्तु का रूप धारण करती गयी। वह पुरुष के अधिकार बोध का शिकार होते हुए उसकी अनुचरी के रूप में प्रयुक्त होने लगी। अर्थवादी समाज की रचना में नारी का स्थान दोयम होने लगा। पुरुष परमेश्वर और नारी उसकी सेविका के रूप में पुरुषवादी समाज में स्वीकृत होने लगी। जिससे नारी के स्वतंत्र अस्तित्व में भरपूर कुठाराघात हुआ। नारी शोषण की परम्परा का श्रीगणेश वैदिकोत्तर काल में प्रारम्भ हुआ।
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