International Journal of Advanced Educational Research

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ISSN: 2455-6157

Vol. 3, Issue 5 (2018)

विश्व पुस्तकालय की प्रथम रचना के रूप में ऋग्वेद का ऐतिहासिक एवं सामाजिक महत्व

Author(s): डाॅ0 दुर्गेश कुमार सिंह
Abstract: वेद शब्द संस्कृत की विद् धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। वेद शब्द का सामान्य अर्थ है ज्ञान। वस्तुतः वेद से ताप्पर्य चार प्राचीन ग्रन्थों से है जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्व वेद हैं। डाॅ0 लाल के अनुसार - “वेद वे हैं जिनमें सब उत्तम ज्ञान विद्यमान है, जिनके द्वारा सब कुछ जाना, विचार व प्राप्त किया जा सकता है।” यों तो वेद चार हैं परन्तु प्राचीन परम्परा के अनुसार कुछ ऐसी मान्यता प्रसिद्ध है कि प्रथम एक ही वेद था, जिसे बाद में जाकर लोगों के पठन की सुविधा की दृष्टि से चार भागों में विभक्त कर दिया गया। भारतीय परम्परा के अनुसार वैदिक ज्ञान नित्य है एवं सृष्टि की रचना के आदि में ईश्वर ने वेदों की रचना की। वेदांत दर्शन के अनुसार वेद अनादि तथा अपौरूमय (किसी पुरूष के द्वारा न रचित) ज्ञान है जो प्रलय के बाद भी बना रहता है एवं सृष्टि के आदि में पुनः ईश्वर के द्वारा आविर्भूत होता है। आधुनिक युग में एक सुखद प्रवृत्ति का उद्भव हुआ है वैज्ञानिक दृष्टि से वेदों का अध्ययन। यद्यपि वेद विज्ञान की पुस्तकें नहीं है नहीं उनमें विज्ञान के सिद्धांतों को खोजा जा सकता है किन्तु फिर भी विज्ञान उनमें के सिद्धान्तों को खोजा जा सकता है किन्तु फिर भी विज्ञान की विभिन्न शाखाओं भौतिकी, गणित, आयुर्विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र आदि की दृष्टि से वेदों का अध्ययन हुआ है। पं0 मधुसूदन ओझा, गिरिधर शर्मा व चतुर्वेदी आदि विद्वानों ने वेदों में निहित वैज्ञानिक तथ्यों का अध्ययन किया है।
Pages: 44-46  |  211 Views  87 Downloads
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