International Journal of Advanced Educational Research


ISSN: 2455-6157

Vol. 5, Issue 2 (2020)

यथार्थवाद के अंकन में काशीनाथ सिंह का कलात्मक हस्तक्षेप

Author(s): विनय शंकर
Abstract: यथार्थ और सत्य एक ऐसी दृष्टि है, जिसके उदय और बहुरूपात्मक विकास का ऐतिहासिक महत्त्व है। यथार्थ साहित्य का वह पहलू है, जिसने विशेष रूप से कथा की अंतर्वस्तु और संगठन में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है। यहाँ तक की कला-साहित्य के अनेक क्षेत्रों में उसकी छाप देखी जा सकती है। यथार्थ के संबंध में यह कथन बड़ा ही सत्य है, ‘‘जो कुछ नहीं घटित हुआ वह उतना ही सत्य है, जो घटित हुआ है।’’ हिंदी कहानी में ‘यथार्थ’ का अर्थ प्राकृतिक दृश्यों, तथ्यों, बाह्यवस्तु वर्णन तक ही समझा जाता था, परन्तु समकालीन कहानी जो ‘यथार्थ’ की ही कहानी है, उसका यथार्थ जीवन की अनेक तहों में लिपटा है। ये विभिन्न तहों सामाजिक, पारिवारिक संबंधो, दाम्पत्य, धर्म, राजनीति, साम्प्रदायिकता और जातीयता आदि की बहुआयामी है। यथार्थ एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है। इसे रचनाकार की अंतिम मंजिल नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि कोई भी यथार्थ अंतिम नहीं हो सकता है। इस परिवर्तनशील जगत में सब कुछ परिवर्तित हो रहा है। समकालीन कहानी के बदलते नए परिवेश का यथार्थ ही अधिक उभरा है। यथार्थ अनेक रूपों में उद्घाटित होता रहता है, उसे सही समय पर पहचानने की आवश्यकता है। समकालीन कहानी नव-औपनिवेशिक विकास के भयावह यथार्थ का मुकाबला कर रही है और उससे टकरा रही है।
Pages: 14-15  |  176 Views  53 Downloads
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