International Journal of Advanced Educational Research

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International Journal of Advanced Educational Research
International Journal of Advanced Educational Research
Vol. 5, Issue 2 (2020)

विद्यालयी शिक्षा में शिक्षक की भूमिका


डाॅ0 अशोक कुमार

शिक्षक वह धुरी है जिसके चारो ओर सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली चक्कर लगाती है। समाज में अध्यापक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बौद्धिक परम्परायें और तकनीक कौशल पहुचाने का केन्द्र है और सभ्यता के प्रकाश को प्रज्वलित करने में सहायता देता है। एक सच्चा अध्यापक जीवन पर्यंत विद्यार्थी बना रहता है। शिक्षा की प्रक्रिया में अध्यापक एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हैं और वस्तुतः वहीं हमारी संस्कृति के भविष्य का संरक्षक है। छात्र के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने वाला एक ज्ञानरूपी प्रकाश दिखाकर मानवता के पथ को आलौकित करने वाला कहा जाता है। कोठारी कमीशन ने भी अध्यापक को राष्ट निर्माता की संज्ञा दी है। आशय यह है की शिक्षक सामान्य सामाजिक व्यक्ति से अधिक चरित्रवान, उदार, सहिष्णु तथा मर्यादित होता है। विद्यालय में पर्याप्त संख्या में विभिन्न दक्ष एवम सुयोग शिक्षक का होना एक अनिवार्य आवश्यकता है। शैक्षिक कार्यक्रम की सफलता अध्यापक के व्यवहार, योग्यताओं एवं कार्यप्रणली पर ही निर्भर करती है। वर्तमान समय में शिक्षक छात्र अनुक्रिया में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। चूंकि शिक्षा का तात्पर्य बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास से हैं जिसके अन्तगर्त अध्यापक का कार्य ने केवल बालक का मानसिक विकास करना है वरन उसके शारीरिक, नैतिक सर्वांगीण, आध्यात्मिक विकास में भी योगदान करना है। शिक्षक को विषय का ज्ञान होना चाहिए। छात्रों से सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। और उनकी समस्याओं के लिए निर्देशन भी देना चाहिए।
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