International Journal of Advanced Educational Research

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International Journal of Advanced Educational Research
Vol. 5, Issue 5 (2020)

शान्ति के लिए एकता प्रस्ताव (1950) एवं सुरक्षा परिषद् की स्थिति


आनन्द अरोड़ा

शान्ति के लिए एकता प्रस्ताव 1950 पारित होने से पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था सुरक्षा परिषद् थी लेकिन इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद सुरक्षा परिषद् के स्वरुप में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ तथा इस प्रस्ताव ने महासभा को सुरक्षा परिषद् से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। वर्तमान में महासभा का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। क्योंकि इस प्रस्ताव के पारित होने से पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्माताओं का यह विचार था कि सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रधानतया कार्यकारी अंग हो और महासभा एक वाद-विवाद के मंच के रूप में कार्य करे इसी को ध्यान में रखते हुए चार्टर द्वारा सुरक्षा परिषद् को बाध्यकारी शक्तियां प्रदान की गयी तथा महासभा को केवल सिफारिश करने का अधिकार दिया गया था। लेकिन कालान्तर में परिस्थितियां बदलने के साथ-साथ 3 नवम्बर, 1950 को ‘शान्ति के लिए एकता प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें महासभा के कार्य तथा शक्तियों का महत्व बढ़ता गया तथा सुरक्षा परिषद् का प्रभाव घटा है। इस प्रस्ताव के सम्बन्ध में विख्यात विधिशास्त्री कुन्ज के शब्दों में - “यह सुरक्षा परिषद् से कुछ शक्तियां लेकर महासभा को देने का प्रस्ताव था जिससे निषेधाधिकार (वीटो) से बचा जा सके तथा संयुक्त राष्ट्र के अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा बनाये रखने के कार्य में कुछ संशोधन लाया जाय“।
शान्ति के लिए संगठित (एकता) होने का प्रस्ताव 1950 का रूस द्वारा विरोध किया गया लेकिन न्याय के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने इस प्रस्ताव को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया। अतः इस प्रस्ताव के माध्यम से महासभा के कार्य तथा शक्तियां अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई। हालांकि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा बनाये रखने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ अपने उद्देश्यों को तभी प्राप्त कर सकता है जब महासभा तथा सुरक्षा परिषद् एक दूसरे के साथ सहयोग करे तथा मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय संकटों का निवारण करे। उपरोक्त आदि कारणों से इस विषय पर अध्ययन महत्वपूर्ण है।
Pages : 15-18